देश में मानवीय सामाजिक विज्ञान के लिए चिंतित

0
390

[1:39 PM, 22/4/2017] Neha: देश में मानवीय सामाजिक विज्ञान के लिए चिंतित :: हाड़ माँस मानव, महात्मा गाँधी की हत्या के बाद 11 फ़रवरी, 1948 को वाशिंगटन में आयोजित एक स्मृति-सभा को भेजे अपने संदेश में आइंस्टाइन ने कहा, ‘’वे सभी लोग जो मानव-जाति के बेहतर भविष्य के लिए चिंतित हैं, वे गाँधी की दुखद मृत्यु से अवश्य ही बहुत अधिक विचलित हुए होंगे। अपने ही सिद्धांत, यानी अहिंसा के सिद्धांत का शिकार होकर उनकी मृत्यु हुई। उनकी मृत्यु इसलिए हुई कि देश में फैली अव्यवस्था और अशांति के दौर में भी उन्होंने किसी भी तरह की निजी हथियारबंद सुरक्षा लेने से इनकार कर दिया। यह उनका दृढ़ विश्वास था कि बल का प्रयोग अपने आप में एक बुराई है और जो लोग पूर्ण शांति के लिए प्रयास करते हैं, उन्हें इसका त्याग करना ही चाहिए। अपनी पूरी ज़िंदगी उन्होंने अपने इसी विश्वास को समर्पित कर दी और अपने दिल और मन में इसी विश्वास को धारण कर उन्होंने एक महान राष्ट्र को उसकी मुक्ति के मुक़ाम तक पहुँचाया। उन्होंने करके दिखाया कि लोगों की निष्ठा सिर्फ़ राजनीतिक धोखाधड़ी और धोखेबाज़ी के धूर्ततापूर्ण खेल से नहीं जीती जा सकती, बल्कि वह नैतिक रूप से उत्कृष्ट जीवन का जीवंत उदाहरण बनकर भी हासिल की जा सकती है।”

आइंस्टाइन शायद यह जानते थे कि भविष्य में दुनिया के नेता अक्सर इस पहली क़िस्म की राजनीति के रास्ते पर चलेंगे, यानी ”लोगों की निष्ठा सिर्फ़ राजनीतिक धोखाधड़ी और धोखेबाज़ी के धूर्ततापूर्ण खेल से” जीतेंगे ; इसीलिए 2 अक्टूबर, 1944 को गाँधी के 75वें जन्मदिवस पर उन्होंने अपने संदेश में लिखा—”आनेवाली नस्लें शायद मुश्किल से ही विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी धरती पर चलता-फिरता था।”

 

आधुनिक मानव सभ्यता को दो अनमोल धरोहरों का एक दूसरे के प्रति विश्वास और प्रेम को देखना हो तो गांधी जी और आइन्स्टीन के पत्रों और संवादों को देखा जा सकता है । आइन्स्टीन द्वारा गांधी जी के लिए जो शब्द इस्तेमाल में लाये गए हैं , निःसंदेह वह गांधी जी के प्रति उनके गहरे प्रेम को दर्शाते हैं ।

(डायरी–97)

नेहा नेमा शोधार्थी महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविधालय वर्धा

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here