सवाल है बिना मीडिया ट्रायल से कालाधन वापसी क्या , एक शेर बनाया मैंने रचनात्मक”

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नोटबंदी से काले धन की नसबंदी
ये न पूछ शिकायतें कितनी है तुझ से
तू बता तेरा कोई सितम बाकी तो नहीं…
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इन दिनों कुछ प्रभावी लोग नाराज हैैं। हजार पांच सौ के नोट बंद होने के बाद अपने पराये सब कोस रहे हैैं। मगर खास लोगों को छोड़ दें तो देश के मेंगो पीपुल्स यह भी कहते हैैं कि नोटबंदी एक तरह से कालेधन की नसबंदी जैसा है। नसबंदी देश में आपातकाल (1975) के दौरान लागू की गई थी। तब देश जनसंख्या विस्फोट के खतरे से दो-चार हो रहा था और अब पूरा मुल्क कालेधन के धमाकों से जूझ रहा है। नसबंदी के दौरान कुछ गलतियां भी हुई मगर उसके बाद बच्चे दो ही अच्छे का स्लोगन ऐसा चला कि अब कम ही होंगे जो तीन बच्चे पैदा करें… शायद पैसे देने पर भी नहीं। आदत में जो आ गया है। पति तैयार होता और न बीबी….। चीन में ऐसी आदत पड़ी कि वहां अब मिया-बीवी बिना बच्चों के ही खुश हैैं। सरकार संतान उत्पत्ति के लिये प्रेरित करती है। बहरहाल बहुत सोचने समझने के बाद विपक्ष ने बंगाल को छोड़कर देश में 28 नवंबर को नोट बंद के विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया है। उनके विरोध प्रदर्शन को कुछ मोदी भक्तों का भी समर्थन मिल सकता है। मगर देरी से लिए बंद के निर्णय पर सवाल होने शुरू हो गए हैं। शायद यह 15-16 नवंबर तक होता तो विपक्ष को सबसे ज्यादा समर्थन मिलता। खेल और राजनीति में टाइमिंग बड़ी खास होती है। नोटबंदी के विरोधी मौका थोड़ा मिस कर गए लगते हैं। बेशक परेशानियां बहुत हैं। मगर पब्लिक थोड़ा उसकी आदी हो गई है और हालात नोटबंदी के पहले हफ्ते जैसे विषम नहीं रहे। नोटबंदी के मसले पर देश की अर्थव्यवस्था कैसी रहेगी यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन रिश्वत लेने वाले अफसर और देने वाले ठेकेदार के बीच में संवाद (ठेकेदार को नुकसान संभव है इसलिए बिना नाम के) बेनामी धन या संपत्ति पर इस तरह लिख रहा हूं। इसमें अधिकारी कुछ चिढ़ते हुए कहते हैं -तुम्हारी जुबान काली है पैसे देने में आनाकानी करते थे, लो हजार 500 के नोट भी बंद हो गए। क्या करें? इन पैसों का? ठेकेदार कहता है बंद कर दो पैसे लेना? अफसर – दिल नहीं मानता। जो रखे हैं उनका क्या करें? कैसे हिसाब दें। यह हाल है अभी अफसरों का। रिश्वतखोरी के काले धन को सफेद करने का कोई रास्ता नहीं निकला तो फिर क्या होगा। क्या करेंगे रिश्वतखोर…. भाजपा नेता और समर्थक माने जाने वाले व्यापारी भी मोदी काल में परेशान हैं। जैसे कभी लोग आपातकाल में हैरान थे। हालांकि तब महान नेता विनोवाभावे जी ने आपातकाल को अनुशासन पर्व कह कर स्वागत किया था। नोटबंदी को मोदी काल बताने वाले कई नेता स्वागत में पलक पांवड़े बिछाए इसे राष्ट्रवाद के साथ बेईमानी और ईमानदारी के बीच का संघर्ष बता रहे हैं। सोशल मीडिया प्रायोजित युद्ध से भरा पड़ा है। नोट बंदी को नकली नोट और आतंकवाद की कमर तोड़ने वाला बताया जा रहा है। दूसरी तरफ विरोधी द्वारा इसे तीन फीसदी भ्रष्टों का कालाधन रद्दी करने के लिये 97 प्रतिशत देशवासियों को तंग करने वाला बताया है। काले धन और आतंकवाद की नसबंदी के लिए की गई नोटबंदी का निर्णय जब उल्टा पड़ता देखा तो प्रधानमंत्री भाषाणों में रोए भी। इससे थोड़ी सहानुभूति भी शायद मिली हो क्योंकि देश की जनता भावुक भी तो है। काला धन देश में लाने के लिए चुनाव में भाजपा ने जो वादे किए थे। विपक्ष द्वारा उसकी बार-बार याद दिलाने के जवाब में नोटबंदी का निर्णय आया। मगर पीएम के रोने को लेकर विरोधियों की प्रतिक्रिया स्वरुप यह शेर को फिट बैठता है –
वो रोये बहुत स्पीचों में हिकमत (चतुराई) इसको कहते हैैं,
मैैं समझी खैरख्वाह उनको हिमाकत (मूर्खता) इसको कहते हैैं।
मोदी काल में जो खबरें आ रही हैं बेनामी संपत्ति वालों को लिए अच्छी नहीं है। अब पुरानी प्रॉपर्टी की ई-रजिस्ट्री करानी होगी। ज्यादा संपत्ति पर हिसाब देना होगा। सोना-चांदी खरीदने वाले और बेचने वालों को सरकार को सूचना देनी होगी। सीमा से ज्यादा जवाहरात लेने वालों से हिसाब मांगा जाएगा। इस बीच अच्छी चर्चा यह है कि सरकार काला धन सफेद करने के लिए कोई नया प्लान लाने वाली है। साठ फीसदी टैक्स दो, शेष राशि से 75 फीसदी एफडी करो। हालांकि यह सब अभी केवल अफवाह के रूप में ही बाजार में पंख लगाए उड़ रही है। मगर जो नोटों पर कुंडली मारे बैठे हैं उन्हें इस तरह की अफवाह के सच होने का बेसब्री से इंतजार है। मोदी सरकार के फैसलों को लेकर एक शेर खासा मौजू है
इब्तिदाए इश्क है रोता है क्या,
आगे-आगे देखिए होता है क्या…

काले धन की जड़ तो ये है
नोटबंदी के पक्षकार कहते हैं कि काला धन कम होगा, भ्रष्टाचार कम होगा। ऐसे जुमले खूब उछल रहे हैं। लोग मोदी से पूछते भी हैैं कि दिल पर हाथ रख कर कहना आप सफेद धन से पीएम बने हैं। मशहूर वकील राज्यसभा सदस्य राम जेठमलानी कहते हैं -यह बड़े चोरों को बचाने का कवरअप ऑपरेशन है। मगर काले धन और भ्रष्टाचार के सबसे बड़े कारणों में हैं नाफरमान नौकरशाही। गुड गवर्नेंस तो एक जुमला बनकर रह गया है। तय समय सीमा में काम नहीं होना ही भ्रष्टाचार है। इसकी जड़ कुशासन है। इस पर सर्जिकल स्ट्राइक जरूरी है। लोगों का नोटबंदी स्वागत के बीच सवाल है मोदी काल में कम से कम भाजपा शासित राज्यों में सुराज कब आएगा…? मध्यप्रदेश को ही लें तो भ्रष्टाचार में लिप्त दो अधिकारी पुरस्कार स्वरूप कलेक्टर हैं। उन पर लोकायुक्त में मामले दर्ज हैं। लोकायुक्त ने भ्रष्ट अफसरों पर केस चलाने की अनुमति हेतु सरकार के पास फाइलें भेजी हैं। मगर लंबे समय से उन्हें दबाकर रखा है। इसके क्या मायने हैं। भ्रष्टों के प्रति सरकार का यह प्यार मोदी जी के सपनों को तोड़ने वाला है। शहडोल-नेपानगर उप चुनाव जीतने के बाद मोदी के सामने शिवराज सरकार की छाती 56 इंच की है। फिर भी जो हालत है उस पर कह सकते हैं- जितने सवाल और उंगलियां आज लोकतंत्र पर उठ रही उतनी ही मीडिया पर, क्या यह मीडिया सामाजिक भूमिका विश्वसनीय तरीके से निभा रहा आज मीडिया की साख पर तमाम सवाल हो रहे है बिक गया मीडिया , बाजारू मीडिया , माफिया, वगैरह ,
खुशी है सबको आपरेशन में खूब नश्तर ये चल रहा है
मगर किसी को खबर नहीं मरीज का दम निकल रहा है

नेहा नेमा शोधार्थी महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविधालय वर्धा

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