बुद्ध का वो सच्चा इतिहास जो आजतक आपसे छिपाया गया है, जानकर दंग रह जाएंगे आप

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नई दिल्ली। भाषाविशेषज्ञ और इतिहासकार राजेन्द्र प्रसाद सिंह अपने लेखों द्वारा बुद्ध के असली इतिहास देश के सामने लाते हैं। भाषाविशेषज्ञ राजेन्द्र अपने तर्कों से अपनी बात को साबित करते हैं। आज बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर हम आपको कुछ ऐसे तथ्य बताएंगे जो आपको हैरान कर देंगे।

 

पढ़े राजेन्द्र प्रसाद सिंह द्वारा उजागर किए गए बुद्ध के असली इतिहास को…

 

1826 में मैसन ने पहली बार हड़प्पा में बौद्ध स्तूप ही देखा था, बर्नेस (1831) और कनिंघम (1853) ने भी। राखालदास बंदोपाध्याय ने भी 1922 में बौद्ध स्तूप की खुदाई में ही सिंधु घाटी की सभ्यता की खोज की थी।

 

राखीगढ़ तो हाल की घटना है, वहाँ भी सिंधु घाटी की सभ्यता बौद्ध स्तूप की खुदाई में ही मिली है- सिंधु घाटी सभ्यता का विशाल स्थल! इसलिए; सिंधु घाटी की सभ्यता की खुदाई में बौद्ध स्तूप नहीं मिला है बल्कि बौद्ध स्तूप की खुदाई में सिंधु घाटी की सभ्यता मिली है। मगर इतिहासकारों को सिंधु घाटी की सभ्यता के इतिहास को ऐसे लिखने में जाने क्या परेशानी है, जबकि सच यही है कि सिंधु घाटी की सभ्यता बौद्ध सभ्यता है।

 

ये अशोक का रुम्मिन देई स्तंभलेख है। यह स्तंभलेख वही खड़ा है, जहाँ बुद्ध की माँ ने बुद्ध को जन्म दी थी। रुम्मिन में जुड़ा हुआ देई (देवी ) शब्द साबित करता है कि रुम्मिन कोई महिला थी जिनकी पूजा वहाँ होती है। ये रुम्मिन नामक महिला कौन थी? जी हाँ, बुद्ध की माँ थीं।अभिलेख से पता चलता है कि बुद्ध की माँ का वास्तविक नाम लुंमिनि रहा होगा। यही आगे चलकर स्थानबोधक लुंबिनी हो गया है।

 

 

तस्वीर में क्रकुच्छंद बुद्ध का स्मारक है और उनके स्मारक के बारे में ऐतिहासिक जानकारी दी गई है।ये तस्वीर दिनेश कुमार चौधरी ने वहाँ जाकर उपलब्ध कराई है।
गौतम बुद्ध से पहले हुए थे क्रकुच्छंद बुद्ध। मेजर फोर्ब्स ने जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसायटी, जून, 1836 अंक में क्रकुच्छंद बुद्ध का समय 3101ई. पू. बताया है।
आखिर 3101 ई. पू. में क्या हुआ था कि कलियुग का आरंभ 3101ई. पू. से माना जाता है,जबकि 3101ई. पू. ही क्रकुच्छंद बुद्ध का समय है।

गल्प कथाओं में कलियुग को अनैतिक, अत्याचारी और पतन का युग कहा जाता है जिसका आरंभ 3101 ई. पू. में माना जाता है।
मगर 3101 ई. पू. तो पुरातत्व के अनुसार सिंधु घाटी की सभ्यता का युग है। दूसरे शब्दों में, जिसे कलियुग कहा जाता है, वह वस्तुतः सिंधु घाटी की सभ्यता का समय है।

ललितविस्तर का जो लेखक इतना बड़ा झूठ लिख सकता है कि बुद्ध के गुरु विश्वामित्र थे, वह दूसरा झूठ क्यों नहीं बोल सकता है कि बुद्ध सिर्फ ब्राह्मण या क्षत्रिय के घर में जन्म ले सकते हैं; चांडाल, शूद्र या निम्न जाति में नहीं। इसका मतलब ही हुआ कि बुद्ध चांडाल, शूद्र या निम्न जाति में ही पैदा हुए थे।
राम का गुरुकुल जाने की कथा को याद कीजिए। राम बाल्यकाल में वशिष्ठ के गुरुकुल में पढ़ने जाते हैं और वशिष्ठ सोचते हैं कि ऐसे वेद प्रज्ञा राम को मैं क्या सिखाऊंगा? अप्रामाणिक बौद्ध ग्रंथ ललितविस्तर में यही कथा सावधानीपूर्वक घूमा- फिराकर बुद्ध के साथ जोड़ी गई है। ललितविस्तर के अनुसार बुद्ध बाल्यकाल में विश्वामित्र के गुरुकुल में पढ़ने जाते हैं और वे 64 लिपियों का नाम लेते हुए विश्वामित्र से पूछते हैं कि मुझे किस लिपि में सिखाएंगे? विश्वामित्र सोचते हैं कि ऐसे लिपि प्रज्ञा बुद्ध को मैं क्या सिखाऊंगा? वशिष्ठ और विश्वामित्र तो समकालीन थे। बुद्ध के साथ विश्वामित्र को टैग करके ऐसे होती है सभ्यता की चोरी!

प्रथम तस्वीर माननीय संतोष पटेल ने एक पुस्तक के पन्ने की भेजी है। लिखा है कि मनौती स्तूप बनाने की परंपरा बौद्धों की है। छठ पर जो मिट्टी का सिरसौता (छठ का प्रतीक) बनाया जाता है, वह मनौती स्तूप से मेल खाता है। ऐसे दर्जनों मनौती स्तूप नालंदा के खंडहर में मौजूद हैं। दूसरी तस्वीर माननीय संजय भारती ने छठ का प्रसाद अघरवटा की भेजी है जिसमें बौद्धों के प्रतीक- चिह्न पीपल और चक्र आप देख सकते हैं। इतिहास लोक परंपराओं में भी जिंदा होता है।

 

 

बौद्ध भिक्षु का अर्थ भीखमंगा नहीं है। यह गलत व्याख्या है। पूरा जापान बौद्ध भिक्षुओं से भरा पड़ा है। जापान भीख मांग रहा है? जापान तो आपको दे रहा है।
अरुणाचल प्रदेश के मोंपा बौद्ध हैं। वे भीख मांग रहे हैं क्या? आप नालंदा, राजगीर, गया, सारनाथ गए होंगे। आपने देखा है किसी बौद्ध भिक्षु को भीख मांगते हुए?
भारत में हिमालय के पाद- प्रदेश में बसे खाम्ती, तामंग या मोंपा सभी बौद्ध भिक्षु ही हैं। आपने देखा है इनको भीख मांगते हुए? ये सभी श्रमशील और खेतिहर जातियाँ हैं।
बौद्ध भिक्षुओं को आखिर क्यों श्रमण कहा जाता है? श्रमण का क्या अर्थ होता है? भिखमंगा होता है क्या? जी, नहीं। श्रमण का अर्थ श्रम करने वाला होता है। आप श्रमण को भिखमंगा किस आधार पर कह रहे हैं। आपको पता होगा कि इसी तर्ज पर उर्दू में भी एक शब्द प्रचलित है- फकीर। ये मितव्ययी और संत लोग हैं। इन्हें आप भिखमंगा नहीं कह सकते हैं। विश्वास कीजिए ये भिखमंगा नहीं हैं।

 

सिंधु घाटी की सभ्यता आस्ट्रो- द्रविड़ों का ही है। दरअसल बौद्ध सभ्यता का क्रमशः विकास हुआ है। उसमें कई चीजें बाद में जुड़ी हैं और कई चीजें हटी हैं। वृक्ष, विशेषकर पीपल पूजा किन की है, आस्ट्रो- द्रविड़ों का ही तो है। फिर ये सब बौद्धों में भी तो है। संथालों का मारंग मारु कौन है? बुद्ध की तरह ज्ञान और प्रज्ञा के देवता हैं। साहेबगंज के संथालों में धार्मिक क्रिया- कलापों के दौरान सिंधु लिपि जैसी लिपि का प्रयोग होता है। सिंधु लिपि तो ब्राह्मी लिपि है नहीं और न ही उसकी भाषा पालि है। बौद्ध सभ्यता का क्रमशः विकास या परिवर्तन इसे जो भी कह लें, हुआ है। हम बौद्ध धर्म को आज की तारीख में देख रहे हैं। हम आदिवासी समाज को आज की तारीख में देख रहे है। हंटर ने लिखा है कि संथालों के बीच बौद्ध धर्म प्रचलित था। आज भी कई आदिवासी समुदाय बौद्ध ही तो है- मोंपा, शेरडुकपेन, मेंबास, खाम्ती, सिंहपो, तामंग- ये सभी बौद्ध ही तो हैं। आप खाम्ती आदिवासियों का रामायण पढ़ लीजिए- पूरी तरह से बौद्ध धर्म में भीगा हुआ है। निचले बंगाल में, आदिवासी बहुल इलाकों में शिव की नाक चपटी, होठ मोटे हैं। शिव आदिवासियों के हैं, योग संस्कृति के हैं; वहीं योग संस्कृति जो बौद्ध सभ्यता में मौजूद है और वही सिंधु घाटी की सभ्यता में भी। बौद्ध सभ्यता की आदिम विशेषताएं आदिवासियों में है। बौद्ध सभ्यता का आरंभिक विकास आदिवासियों ने ही किया है। बौद्ध सभ्यता का विकास हजारों साल में हुआ है, कई पीढ़ियों ने, कई लोगों ने इसके विकास में योगदान किया है।

By S J Basha

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