इंटरनेट: घनी असुरक्षा के बीच बच्चे और साइबर क़ानून

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इंटरनेट के सन्दर्भ में बच्चों की असुरक्षा का मतलब आखिर है क्या? इसके लिए हम कुछ तकनीकी पहलुओं को समझने की कोशिश करते हैं. सुरक्षित इंटरनेट के सन्दर्भ में बच्चे कौन हैं?: यूं तो फेसबुक कहता है कि 13 साल की उम्र में उसके मंच का उपयोग किया जा सकता है, स्नेप चैट, व्हाट्स एप, वायबर, गूगल प्लस भी यही कहते हैं, किन्तु भारत में नियम अनुसार 18 साल से कम उम्र का कोई भी व्यक्ति “बच्चा” माना जाता है और इससे कम उम्र में इस तरह इंटरनेट के उपयोग की अनुमति नहीं है. होता क्या है? सच यह है कि कम उम्र के व्व्यक्तियानी बच्चे अपनी उम्र के बारे में गलत जानकारी देकर या झूठ बोलकर इंटरनेट के अलग-अलग मंचों पर खुद को दर्ज करते हैं. बाल पोर्नोग्राफी, बच्चों का अश्लील चित्रण और यौनिक उपयोग: किसी के भी द्वारा ऐसी सामग्री जिसमें बच्चों का अश्लील, यौनिक चित्रण हो या इस मकसद के लिए बच्चों का उपयोग हो, उसका प्रकाशन और प्रसारण {सूचना प्रोद्योगिकी कानून 2008 की धारा 67बी (ए)}. यह भी पढ़ें: इंटरनेट की एक सबसे बड़ी चुनौती है ‘चाइल्ड पोर्नग्राफी’ जो कोई भी ऐसी सामग्री का निर्माण करता है, सामग्री इकठ्ठा करता है, ऐसे चित्र बनाता है, ऐसे वेबसाईट देखता है-उपयोग करता है, डाउनलोड करता है, प्रोत्साहित करता है, साझा करता है, जिसमें बच्चों का अश्लील, कामुक, यौनिक प्रस्तुतीकरण होता है; {सूचना प्रोद्योगिकी कानून 2008 की धारा 67बी (बी)}. किसी बच्चे को अन्य बच्चों के साथ आनलाइन यौनिक-अश्लील सम्बन्ध बनाने के लिए प्रेरित करता है या दबाव डालता है और बच्चों का आनलाइन-इंटरनेट पर शोषण-दुरुपयोग करता है. इन दशाओं में अपराध साबित होने पर 7 साल ही सजा और 10 लाख रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है. पीछा करना और नजर रखना (सायबर स्टॉकिंग): जब किसी व्यक्ति का ईमेल या इंटरनेट गतिविधियों/इलेक्ट्रानिक संचार के जरिये लगातार और निरंतरता के साथ पीछा किया जाता है, तो उसे सायबर स्टाकिंग कहा जाता है. ऐसे मामलों में सूचना प्रोद्योगिकी कानून की धारा 66ए, 66सी और 66ई के साथ साथ भारतीय दंड संहिता की धारा 506 और 509 लागू होती है. सायबर बुलिंग – इंटरनेट, ईमेल या अन्य किसी इलेक्ट्रानिक संचार तकनीक का उपयोग करते हुए किसी को प्रताड़ित करना, नीचा दिखाना, उलाहना देना, अपमानित करने या धमकाने जैसे व्यवहार को सायबर बुलिंग कहा जाता है. ऐसे मामलों में सूचना प्रोद्योगिकी कानून की धारा 66ए, 66सी और 66ई के साथ साथ भारतीय दंड संहिता की धारा 506 और 509 लागू होती है. अश्लील या पोर्न सामग्री प्रसारित करना: ईमेल, इंटरनेट या सूचना तकनीक के किसी माध्यम से यौन व्यवहार सम्बन्धी चित्र, ध्वनि, कार्टून, एनीमेशन, विडियो समेत कोई भी सन्देश भेजना. गृह मंत्रालय (भारत सरकार) द्वारा जारी एडवायजरी भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने 4 जनवरी 2012 को बच्चों के खिलाफ होने वाले सायबर अपराधों को रोकने और उनसे निपटने के लिए एडवायजरी जारी की थी. उसके कुछ महत्वपूर्ण बिंदु इस प्रकार हैं – 1. कानून लागू करने के लिए जिम्मेदार संस्थाओं, मसलन पुलिस, अभियोजन और न्यायपालिका और सामान्य समाज को सूचना प्रोद्योगिकी कानून 2008 के बारे में प्रशिक्षित किये जाने, संवेदनशील बनाए जाने और सक्रीय कार्यवाही के लिए तत्पर बनाने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों और सेमीनार का आयोजन किया जाना चाहिए. इसमें बच्चों के खिलाफ होने वाले सायबर अपराधों पर मुख्य ध्यान हो. 2. किशोर न्याय अधिनियम के तहत बनी विशेष किशोर पुलिस इकाईयों को संवेदनशील बनाने और प्रशिक्षित किया जाना चाहिए. यह भी पढ़ें: बच्चे और युवाओं पर एक तरह का पैना हमला है ‘पोर्नोग्राफी’ 3. पालकों, शिक्षकों और बच्चों को जागरूक किया जाए कि वे किसी भी तरह के आपत्तिजनक सामग्री-अश्लील प्रस्तुति को बारे में रिपोर्ट करें. बच्चों को सायबर अपराधों के बारे में जानकारी दी जाना चाहिए. 4. ऐसी वेबसाईट और शोषण नेटवर्किंग साइट्स की निगरानी की जाना चाहिए, जो अश्लील और बच्चों के आपत्तिजनक चित्रण का प्रसार करती हैं. जरूरी है कि “पालकों की निगरानी-नियंत्रण में इंटरनेट के उपयोग का साफ्टवेयर-पेरेंटल कंट्रोल सॉफ्टवेयर” का इस्तेमाल हो. 5. डिजिटल/तकनीकी सबूतों को इकठ्ठा किये जाने और उनकी सुरक्षा से सम्बंधित प्रशिक्षण हो. 6. जिन बच्चों के साथ अपराध या शोषण हुआ हो, उनकी पहचान को सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए. 7. पुलिस नियंत्रण कक्ष और बच्चों के संरक्षण के लिए संचालित हो रही हेल्पलाइन 1098 के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम होना चाहिए. 8. राज्य पुलिस की वेबसाईट, सोशल नेटवर्किंग साइट्स और विभिन्न वेब ब्राउजर्स पर बच्चों के लिए इंटरनेट के सुरक्षित उपयोग से सम्बंधित सामग्री वाला विशेष कोना होना चाहिए. 9. ऐसी व्यवस्था विकसित होना चाहिए, जिससे सायबर कैफे के रिकॉर्ड्स को एक केन्द्रीय स्थान से जांचा जा सके. भारत में कानूनी प्रावधान भारत में साइबर अपराध को रोकने के लिए सामान्य तौर आई.टी एक्ट यानी साइबर अपराध के मामलों में सूचना तकनीक कानून 2000 और सूचना तकनीक (संशोधन) कानून 2008 का उपयोग किया जाता है. सूचना तकनीक नियम 2011 के तहत भी कार्रवाई की जाती है. इस कानून में निर्दोष लोगों को साजिशों से बचाने के इतंजाम भी हैं. इसके साथ ही अलग-अलग अपराधों में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), कॉपीराइट कानून 1957, कंपनी कानून, सरकारी गोपनीयता कानून, आतंकवाद निरोधक कानून सहित कई अन्य कानूनों की धाराओं का भी उपयोग किया जाता है. इसी तरह बच्चों के साथ हुए साइबर यौन अपराध के मामले में पॉक्सो भी लगाया जा सकता है. यह भी पढ़ें: डिजिटल दुनिया में बच्चों का शोषण; समाज,परिवार के सामने नई चुनौतियां बच्चों को साइबर अपराध से बचाने के लिए न्यायालयों में मामले भी चल रहे हैं. विधायिका भी इसके लिए चिंतित है. संसदीय समिति ने भी इस पर अपनी सिफारिशें दी है. हाल ही में भारत सरकार ने बच्चों की पोर्नग्राफी पर अंकुश लगाने के लिए भारत में करीब 900 से ज्यादा वेबसाइटों को ब्लॉक कर दिया गया है. यानी इन्हें अब भारत में नहीं देखा जा सकता. इस बात की जानकारी एक सवाल के जवाब में लोकसभा में केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री ने दी. उन्होंने यह भी बताया कि गृह मंत्रालय जल्द ही महिलाओं और बच्चों के खिलाफ साइबर टपराध रोकथाम पर एक प्रोजेक्ट शुरु करने जा रहा है. पोर्न साइट्स को ब्लॉक ना करने को लेकर जुलाई 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के खिलाफ नाराजगी जाहिर की थी. साइबर अपराध को रोकने के लिए सूचना तकनीक कानून एवं अन्य कानूनों की निम्न धाराएं लगाई जाती हैं – आपत्तिजनक एवं अफवाहपूर्ण सामग्री अगर कोई आदमी सोशल मीडिया या दूसरे ऑनलाइन माध्यम से किसी दूसरे आदमी या समूह की भावनाओं को भड़काता है, अफवाह फैलाता है या फिर किसी की छवि खराब करता है या छवि खराब करने के लिए झूठी जानकारी डालता है या धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाता है, तो उस पर सूचना तकनीक कानून की धारा 66ए के तहत केस दर्ज किया जाता है. (सरकार ने सूचना तकनीक कानून की धारा 66ए के तहत होने वाली गिरफ्तारी के मामले में गाइड लाइंस जारी कर रखी है. इसके तहत प्रावधान है कि किसी आरोपी के खिलाफ कार्रवाई के लिए सीनियर पुलिस अधिकारी की यानी ग्रामीण इलाके में डीएसपी स्तर पर और शहरी इलाकों में आईजी स्तर पर मंजूरी लेना जरूरी है. ऐसे बहुत सारे मामले देखे गए हैं, जिसमें आलोचनाओं के कारण विरोधियों को दबाने के लिए इसका उपयोग किया गया. इस मामले में कोर्ट ने भी कहा है कि पूर्वाग्रह के कारण भी इस धारा का दुरूपयोग किया गया है. साइबर अपराध में सबसे ज्यादा इस धारा के तहत केस दर्ज किया जाता है.) धारा 66ए के तहत दोषी पाए जाने पर 3 साल तक कैद की सजा और या जुर्माने का प्रावधान है. इस अपराध को जमानती अपराध माना गया है. सूचना तकनीक कानून, 2008 इस अधिनियम के अनुसार बच्चा वह माना जाएगा जो कि 18 वर्ष से कम उम्र का हो. इस अधिनियम की दो धाराओं में विशेष रूप से बच्चों से जुड़े अपराध का जिक्र किया गया है. धारा 67 (ठ) के अनुसार बच्चों से जुड़ी किसी भी यौन सामग्री (वीडिओ, ऑडियो या लिखित सन्देश) के प्रसारण या वितरण पर सम्बंधित व्यक्ति को 5 साल तक का कारावास तथा 10 लाख तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है और यही अपराध दोहराने पर 7 साल तक का कारावास तथा 10 लाख तक के जुर्माने का प्रावधान है. साथ ही नेट पर बच्चों के यौन संबंधों को दिखाने या जोड़ने पर भी इस धारा के अंतर्गत अपराध माना जाएगा. परन्तु यह धारा केवल इलेक्ट्रॉनिक माध्यम तक ही सीमित है. विज्ञान, साहित्य या सिखाने के लिए किसी भी प्रकार का प्रकाशन इस धारा के अंतर्गत अपराध की श्रेणी में नहीं आता है. धारा 77 में वर्णित प्रावधानों के अनुसार इस अधिनियम के अंतर्गत बच्चों के विरुद्ध किए गए किसी भी अपराध में समझौता करना वर्जित है और ही कोई भी न्यायालय इसमें समझौता नहीं करा सकती, ना ही ऐसा कोई आदेश पारित कर सकती है. केबल टीवी नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम, 1995 इसका मकसद है केबल टेलिविजन पर प्रसारित कार्यक्रमों का नियमन करना, जिससे बच्चों को संरक्षण मिलता रहे. इसमें प्रावधान है कि केबल सेवा (टेलिविजन) पर ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं दिखाया जाना चाहिए, जिससे बच्चों का अपमान हो. ऐसा कोई विज्ञापन केबल सेवा पर नहीं दिखाया जाना चाहिए, जिससे बच्चों की सुरक्षा खतरे में पड़े या उनमें अस्वस्थ तरीकों के बारे में दिलचस्पी पैदा हो या उन्हें भीख मांगने के लिए लिय मजबूर करे या उन्हें अमर्यादित या अभद्र रूप में दिखाए. इसमें पांच साल तक की सजा और जुर्माने या दोनों का प्रावधान है. लैंगिक अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 लैंगिक अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 यानी पोक्सो कानून बच्चों के इंटरनेट पर शोषण को रोकने और अपराधियों को सजा दिलाने की कोशिश में बहुत महत्वपूर्ण कानून है. यह कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि बच्चों का अश्लील प्रदर्शन भी उनके लैंगिक शोषण और अपराधों का ही हिस्सा है. इसके लिए दस साल तक की सजा का प्रावधान है. पोक्सो कानून कहता है कि यदि कोई व्यक्ति यह जानता है कि कहीं बच्चों का इस तरह शोषण या अश्लील या लैंगिक प्रदर्शन के लिए उपयोग हो रहा है, तो यह उसकी कानूनी जिम्मेदारी है कि वह इसकी सूचना पुलिस को दे. ऐसा नहीं करने पर उसे भी सजा दिए जाने का प्रावधान है. इस कानून के कुछ महत्वपूर्ण प्रावधान इस प्रकार हैं – लैंगिक उत्पीड़न क्या है? धारा 11 लैंगिक उत्पीड़न – किसी व्यक्ति द्वारा किसी बच्चे का लैंगिक उत्पीड़न माना जाएगा, जब ऐसा व्यक्ति – 1. लैंगिक आशय से कोई शब्द कहता है या ध्वनि या अंग विक्षेप करता है या कोई वस्तु या शरीर का कोई भाग इस आशय के साथ प्रदर्शित करता है कि बच्चे द्वारा ऐसा शब्द या ध्वनि सुनी जाए या ऐसा अंग विक्षेप या वस्तु या शरीर का भाग देखा जाए, या 2. लैंगिक आशय से उस व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति के जरिये किसी बच्चे को अपने शरीर या शरीर का कोई भाग प्रदर्शित करने के लिए कहता है, 3. अश्लील साहित्य के प्रयोजन के लिए किसी प्रारूप या मीडिया में किसी बच्चे को कोई वस्तु दिखाता है, या 4. बच्चे को या तो सीधे या इलेक्ट्रानिक, अंकीय या किसी अन्य साधनों के माध्यम से बार-बार या निरंतर पीछा करता है या देखता है या संपर्क बनाता है, या 5. बच्चे के शरीर के किसी भाग या बच्चे को लैंगिक कृत्य में अन्तर्वलित इलेक्ट्रॉनिक फिल्म या अंकीय या अन्य किसी रीति के माध्यम से वास्तविक या बनावटी तस्वीर खींचकर मीडिया का किसी भी रूप में उपयोग करने की धमकी देता है, या 6. अश्लील प्रयोजन के लिए किसी बच्चे को प्रलोभन देता है या उसके लिए परितोषण देता है. अश्लील साहित्य के प्रयोजनों के लिए बच्चों का उपयोग और उसके लिए दंड अश्लील साहित्य के प्रयोजन के लिए बच्चों का उपयोग और उसके लिए दंड (पोक्सो कानून का अध्याय तीन) धारा 13. अश्लील साहित्य के प्रयोजनों के लिए बच्चों का उपयोग – जो कोई भी, बच्चों का उपयोग मीडिया (जिसके अंतर्गत टेलिविजन चैनलों या विज्ञापन या इंटरनेट या कोई अन्य इलेक्ट्रॉनिक प्रारूप या मुद्रित प्रारूप द्वारा प्रसारित कार्यक्रम या विज्ञापन, चाहे ऐसे कार्यक्रम या विज्ञापन का आशय व्यक्तिगत उपयोग या वितरण के लिए हो या नहीं) के किसी प्रारूप में लैंगिक प्रतितोषण, जिसके अंतर्गत – (क) किसी बच्चे की जननेन्द्रियों का प्रदर्शन, (ख) किसी बच्चे का उपयोग वास्तविक या नकली लैंगिक कार्यों (प्रवेशन के साथ या बिना) में करना, (ग) किसी बच्चे का अशोभनीय या अश्लीलतापूर्ण प्रदर्शन है, वह किसी बच्चे का अश्लील साहित्य के प्रयोजन के लिए उपयोग करने के अपराध का दोषी होगा. {इस धारा के प्रयोजनों के लिए “किसी बच्चे का उपयोग” पद के अंतर्गत मुद्रण, इलेक्ट्रॉनिक, कम्प्यूटर या अन्य तकनीक के किसी माध्यम से अश्लील साहित्य तैयार, उत्पादन, प्रस्तुति, प्रसारण, सुकर और वितरण करने के लिए किसी बच्चे के अन्तर्वलित करना है.} दंड – विभिन्न धाराओं में किये गए कृत्यों के लिए पांच साल से दस साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है. धारा 15. बच्चे को अंतर्ग्रस्त (शामिल) करने वाले अश्लील साहित्य के भण्डारण (साहित्य रखने) के लिए दंड – यदि कोई व्यक्ति, जो वाणिज्यिक प्रयोजनों के लिए बच्चे को शामिल करने वाली सामग्री का किसी भी रूप में भण्डारण करता है, वह भी तीन साल तक की सजा या जुर्माने या दोनों से दण्डित होगा. धारा 20. मामले को रिपोर्ट करने के लिए मीडिया, स्टूडियो या फोटो चित्रण सुविधाओं की बाध्यता – मीडिया या होटल या लॉज या अस्पताल या क्लब या स्टूडियो या फोटो चित्रण सम्बन्धी सुविधाओं का कोई कर्मी (या उसका कोई जिम्मेदार व्यक्ति) उन लोगों को बिना बताए, जो बच्चे के अश्लील या लैंगिक उत्पीडन के उपयोग में शामिल हैं, बच्चों के लैंगिक शोषण से सम्बंधित कृत्य (जिसमें अश्लील साहित्य, लिंग सम्बन्धी या बच्चे या बालक या बालिका का अश्लील प्रदर्शन करना भी है) के बारे में विशेष किशोर पुलिस इकाई या स्थानीय पुलिस को इसकी जानकारी अनिवार्य रूप से उपलब्ध करवाएगा. धारा 21. यदि कोई व्यक्ति या संस्थान ऐसे अपराध की रिपोर्ट नहीं करता है, तो उसे भी छः महीने से एक साल की सजा या जुर्माने या दोनों की सजा हो सकती है. चाइल्ड लाइन (फोन नंबर 1098) चाइल्ड लाइन भारत के सभी बच्चों के संरक्षण के मकसद से संचालित होने वाली टेलीफोन आधारित मुफ्त सहायता सेवा है. इसका उपयोग टोल फ्री नंबर 1098 का उपयोग करके लिया जा सकता है. इसमें कोशिश होती है कि सूचना मिलने पर जरूरतमंद बच्चे तक एक घंटे में सहायता पंहुचा दी जाए. चाइल्ड लाइन पुलिस, अस्पताल और बाल संरक्षण इकाई के साथ समन्वय स्थापित करके काम करती है. बच्चों के शोषण के मामलों में भी इस सेवा के बहुत सक्रिय भूमिका है.

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