काम नहीं आएगा चीनी पटाखे-लड़ियों का ‘राष्ट्रवादी’ बहिष्कार

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दीपावली नजदीक है और इसके साथ ही पूरे देश में एक बार फिर से चीन विरोधी सुर अलापा जाने लगा है. दीपावली से पहले मेड इन चाइना सामान पर सोशल मीडिया प्रतिक्रियाओं से भरा हुआ है और बीते वर्ष की तरह जल्द ही मेनस्ट्रीम मीडिया पर भी इसे लेकर बहस दिखाई दे सकती है. लेकिन आर्थिक आंकड़ों पर नजर डालें तो बीते तीन वर्षों के दौरान चीन को चुनौती देने के लिए भी हमारी मजबूरी भारत-चीन आर्थिक रिश्तों को और मजबूत करने की है. लिहाजा मोदी सरकार ने बीते तीन वर्षों के दौरान चीन से आर्थिक रिश्तों को मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. भारत-चीन व्यापार के आंकड़ों को देखें तो साफ है कि चीन की भारत में पैठ पटाखों से कहीं ज्यादा गहरी है. चीन से पटाखों का आयात 10 लाख डॉलर का भी नहीं होगा. विदेश व्यापार के आंकड़ों के मुताबिक, चीन से भारत का सबसे बड़ा आयात इलेक्ट्रॉनिक्स (20 अरब डॉलर), न्यूक्लियर रिएक्टर और मशीनरी (10.5 अरब डॉलर), केमिकल्स (6 अरब डॉलर), फर्टिलाइजर्स (3.2 अरब डॉलर), स्टील (2.3 अरब डॉलर) का है. 2016-17 में हमने चीन से लगभग 72 अरब डॉलर का आयात किया. 2015-16 में ये 61 अरब डॉलर का था. चीन के बाद भारत का सबसे बड़ा आयात अमेरिका, सऊदी अरब और अमीरात से होता है. लेकिन चीन से होने वाला आयात इन तीनों देशों से होने वाले आयात से अधिक है. आयात के साथ बढ़ रहा व्यापार घाटा लेकिन भारत का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर होने के बावजूद भारत-चीन व्यापार देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी है. दोनों देशों के बीच आयात-निर्यात पूरी तरह चीन के पक्ष में है. 72 अरब डॉलर का आयात करने के साथ ही पिछले साल चीन को हमने महज 21 अरब डॉलर का निर्यात किया था. लिहाजा दोनों देशों के बीच कारोबार से भारतीय खजाने को लगभग 51 अरब डॉलर का व्यापार घाटा देखने को मिला है. यह घाटा लगातार बढ़ता रहा है और माना जा रहा है कि इस रफ्तार से यह घाटा बढ़ता रहा तो बहुत जल्द देश को 100 अरब डॉलर का व्यापार घाटा देखने को मिलेगा. ऐसा इसलिए कि जहां आयात की ज्यादातर वस्तुओं में हमारी निर्भरता चीन पर है वहीं भारतीय उत्पादों को आसानी से चीन में बाजार नहीं मिल रहा है. 51 फीसदी मोबाइल मार्केट पर चीन काबिज मौजूदा समय में भारत लगभग प्रतिवर्ष 70 हजार करोड़ रुपये की मोबाइल फोन सामग्री का चीन से आयात कर रहा है. इस आयात में चीन की प्रमुख कंपनियां हुवाई और जेडटीई शामिल हैं. इसके चलते समूचे भारतीय टेलीकॉम सेक्टर पर चीन की कंपनियों का दबदबा कायम है. भारत में मोबाइल हैंडसेट मार्केट का लगभग 51 फीसदी कारोबार चीन की कंपनियों के पक्ष में है और भारतीय बाजार में जियोमी, ओप्पो, वीवो और वनप्लस का बोलबाला है. 30 फीसदी हाइड्रो और 87 फीसदी सोलर ऊर्जा पर चीन की धाक ऊर्जा एक अन्य सेक्टर है जहां भारत पूरी तरह से चीन पर आश्रित है. 12वीं योजना के मुताबिक देश में कुल पावर जनरेशन क्षमता का लगभग 30 फीसदी चीन से आयात किया गया है. वहीं बीते एक वर्ष के दौरान देश के सौर ऊर्जा क्षेत्र में चीन से आयात मशीनरी के चलते उसका 87 फीसदी बाजार पर कब्जा है. चीन से एफडीआई बढ़ाने की योजना चीन से लगातार बढ़ते व्यापार घाटे को पाटने के लिए केन्द्र सरकार लगातार कोशिश कर रही है. मोदी सरकार का मानना है कि व्यापार घाटे के इतने बड़े अंतर को पाटने के लिए बेहद जरूरी है कि चीन की कंपनियों का भारतीय बाजार में बड़ा निवेश कराया जाए. इस बाबत पूर्व में कॉमर्स मंत्री रहीं निर्मला सीतारमन ने राज्य सभा में बयान जारी कर 2014 में कहा था कि चीन से व्यापार घाटे को कम करने के लिए बेहद जरूरी है कि चीनी कंपनियां भारत के मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में बड़ा निवेश करें. इससे चीन से आयात की तुलना में भारत से चीन के निर्यात में इजाफा देखने को मिल सकता है. साथ चीनी एफडीआई से भारत मैन्यूफैक्चरिंग क्षमता में तेजी के साथ-साथ उन उत्पादों को निर्मित किया जा सकता है जिसकी चीन में मांग हो. यूं बढ़ रहा है चीन का भारत में निवेश भारत सरकार ने चीन के निवेश से देश के कारोबारी हब महाराष्ट्र और गुजरात में एसईजेड निर्मित करने पर करार किया है. इन एसईजेड के लिए संबंधित राज्य सरकारें चीन के साथ करार कर चुकी हैं. महाराष्ट्र सरकार ने पूणे में इंडस्ट्रियल पार्क के लिए चीन की कंपनी बाइकीफोटोन मोटर्स से करार किया है. वहीं गुजरात सरकार और चीन डेवलपमेंट बैंक के बीच गुजरात में इंडस्ट्रियल पार्क के लिए करार किया जा चुका है. एक और करार गुजरात सरकार और चीन के लघु और मध्यम इंडस्ट्रियल निवेश लिमिटेड द्वारा किया जा चुका है जिसके तहत गुजरात में मल्टीपर्पज इंडस्ट्रियल पार्क का निर्माण किया जाना है. साफ है कि चीन से आ रहे पटाखे-बिजली की लड़ियों का ‘राष्ट्रवादी’ बहिष्कार कोई असर नहीं दिखाने वाला. भारत की अर्थव्यवस्था के लिए चीन के बहिष्कार से जरूरी चीनी कंपनियों का सत्कार है ताकि मेक इन इंडिया को सफल बनाया जा सके. चीन की कंपनियों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक को अपनाकर भारत भी मैन्युफैक्चरिंग हब बन सके और विदेश से निर्यात में कमी लाकर आयात में इजाफा किया जा सके. तभी दोनों देशों के बीच के व्यापार घाटे को पाटा जा सकेगा और सही मायने में अर्थव्यवस्था के अच्छे दिन आएंगे.

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