देश में बढ़ती भूख पर राहुल गांधी ने भर पेट शायरी सुनाई

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रामचंद्र कह गए सिया से, ऐसा कलयुग आएगा बंदा जुमले फेंकेगा, भारत गिरता जाएगा आज-कल राहुल गांधी गुजरात में टहल रहे हैं. टहलने के लिए वैसे तो एक और गुजराती बहुत फ़ेमस है. उसके नाम में भी गांधी ही था. लेकिन उस आदमी का मामला अलग था. खैर, राहुल गांधी गुजरात में थे. अब वापस आ गए हैं. वापस आये तो उन्हें बाकी देश-दुनिया की खबर मिली. उन्हें मालूम चला कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत 3 पायदान नीचे खिसक गया है. एक मिनट! ग्लोबल हैंगर इंडेक्स क्या है? पैराग्राफ़ बदलते हैं और फॉर्मैटिंग में बदलाव लाते हैं. स्टोरी अच्छी दिखेगी. ग्लोबल हंगर इंडेक्स. इंग्लिस ज़्यादा है और इसलिए भौकाली लग रहा है. वरना असल में तो ये रैंकिंग है बस. इससे ये पता चलता है कि अमुक देश में कितने लोग भूखे हैं और भूख के खिलाफ़ जो लड़ाई चल रही है वो कितनी कारगर सिद्ध हो रही है. यानी रैंकिंग में आप जितना ऊपर हैं, उतना आपके लिए अच्छा है. यानी उस देश में लड़ाई काम कर रही है. अगर आप नीचे हैं तो इसका मतलब ये कि भूख के खिलाफ़ लड़ाई को और ज़ोर देने की ज़रुरत है. इसे हर साल अपडेट किया जाता है. इस बार जो अपडेट आया है उसके हिसाब से हम नॉर्थ कोरिया से भी पीछे छूट गए हैं. ईराक़ से भी. बांग्लादेश से भी. आलम ये है कि 119 देशों में हम 100 नम्बर पर हैं. यानी हमसे बाद बस 19 देश और हैं. साल 2014 में भारत 55 नम्बर पर था. हालांकि इस रैंकिंग में इंडिया के 55 स्पॉट नीचे आने की एक वजह ये भी हो सकती है कि हंगर इंडेक्स को कैल्कुलेट करने का फ़ॉर्मूला बदला गया है. ठीक वैसे ही जैसे देश की जीडीपी कैल्कुलेट करने के लिए जेटली जी ने फ़ॉर्मूला बदल दिया था. मगर फिर भी हमारा नॉर्थ कोरिया और ईराक़ से पीछे होना शोचनीय और शर्मनाक दोनों है. बोलो, “सहमत दद्दा!” तो बात हो रही थी राहुल गांधी के ट्विटर की. गांधी बाबा ने इस रिपोर्ट की खबर को ट्वीट किया. और साथ में लिखी कुछ पंक्तियां. कविवर दुष्यंत की पंक्तियां. दुष्यंत सिर्फ रेल के गुज़रने और पुल के थरथराने तक ही सीमित नहीं थे. मारक लिखते थे. उनकी बाई एक बार खाना बनाने नहीं आई होगी तो उन्होंने भूख-वूख पर कुछ लिख दिया होगा. वही लाइनें राहुल बाबा ने ट्वीट कीं. एक काम करते हैं, हम आपको पूरी नज़्म पढ़ाते हैं. भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुदद्आ मौत ने तो धर दबोचा एक चीते कि तरह ज़िंदगी ने जब छुआ तो फ़ासला रखकर छुआ गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नही पेट भरकर गालियां दो, आह भरकर बददुआ क्या वज़ह है प्यास ज्यादा तेज़ लगती है यहां लोग कहते हैं कि पहले इस जगह पर था कुआं आप दस्ताने पहनकर छू रहे हैं आग को आप के भी ख़ून का रंग हो गया है सांवला इस अंगीठी तक गली से कुछ हवा आने तो दो जब तलक खिलते नहीं ये कोयले देंगे धुआं दोस्त, अपने मुल्क कि किस्मत पे रंजीदा न हो उनके हाथों में है पिंजरा, उनके पिंजरे में सुआ इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां

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