सियासी एक्शन में रजनी, क्या मोदी के लिए तमिलनाडु में साबित होंगे संजीवनी?

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करीब 8 महीने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चेन्नई के दौरे पर थे. तब सुपरस्टार रजनीकांत से उनकी मुलाकात ने सुर्खियां बटोरी थीं और तमाम सियासी गठजोड़ की अटकलों को हवा मिली थी. अब तलाइवा ने सियासी राह पर चलने का ऐलान कर दिया है. नेता रजनीकांत सियासी एक्शन में हैं और राजनीति ही नहीं फिल्मी स्टाइल में सिस्टम बदलने का भी ऐलान कर रहे हैं. माना जा रहा है कि रजनीकांत राजनीति में एंट्री से तमिलनाडु की सियासी तेवर और कैलेवर बदल सकते हैं. रजनीकांत मोदी की तारीफ करते रहे हैं और प्रो-मोदी माने जाते हैं, उनके राजनीति में आने के फैसले से बीजेपी को दक्षिण भारत में उम्मीद की किरण जागी है. ऐसे में सवाल उठता है कि किया पीएम मोदी के मिशन तमिलनाडु के लिए रजनीकांत संजीवनी बनकर तो नहीं आए हैं. तमिलनाडु की सियासत में उथल-पुथल राजनीति में आने के नाम पर रजनीकांत दो दशकों से हां ना करते करते साल के आखिरी सियासी रण में उतरने की घोषणा कर दी. तमिलनाडु की सियासत में रजनीकांत ने ऐसे समय में एंट्री की है, जब जयललिता के निधन के बाद से राज्य की राजनीति में खालीपन है. जयललिता की विरासत को लेकर पार्टी में घमासान मचा हुआ है. उनके उत्तराधिकार का दावा करने वाली शशिकला जेल में हैं. ऐसे समय में रजनीकांत ने सियासत में कदम रखा है. उन्होंने दावा किया कि वह जल्द ही अपनी पार्टी का गठन करेंगे और सभी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेंगे. तमिलनाडु की सियासत पर बीजेपी की नजर राज्य की सियासत में बीजेपी का कोई खास जनाधार नहीं है. इसके बावजूद बीजेपी ने राज्य में उम्मीदें नहीं छोड़ी हैं. रजनीकांत ने अपनी राजनीति किस दिशा में ले जाएंगे, ये साफ नहीं है. लेकिन बीजेपी को उम्मीद है कि रजनीकांत प्रदेश की परंपरागत तरह से हटकर राजनीति करेंगे. तमिलनाडु की द्रविड़ सियासत में अलग रजनीकांत अध्यात्मिक राजनीति करेंगे, जो बीजेपी के भगवा राजनीति की तर्ज पर होगी. रजनीकांत आध्यात्मिक प्रकृति के इंसान हैं. द्रविड़ संस्कृति के बावजूद तमिलनाडु में आध्यात्मिकता की एक मजबूत ज़मीन रही है जिसे बीजेपी कभी दोहन नहीं कर पाई. ऐसे में माना जा रहा है कि रजनीकांत अपने पक्ष में इसे इस्तेमाल करके सियासी जमीन मजबूत कर सकते हैं. प्रो-मोदी रजनीकांत की सियासी इंट्री रजनीकांत प्रो-मोदी माने जाते हैं. उन्होंने कभी भी मोदी के खिलाफ एक भी शब्द नहीं बोला. दयानंद सरस्वती जैसे आध्यात्मिक नेताओं ने कई साल पहले रजनीकांत से बीजेपी के साथ जुड़कर काम करने के लिए कहा था. इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत तक से कई बार मुलाकात कर चुके हैं. लेकिन सुपरस्टार हमेशा बीजेपी को खुले तौर पर जाने-पहचाने जाने के साथ अपने राजनीतिक संबंध बनाने से कतराते रहे हैं. AIADMK के लिए संकट रजनीकांत, करुणानिधि और जयललिता के कद के बराबर का चेहरा हैं. उनके सियासत में कदम रखने से सीधा असर पड़ेगा जिसका नुकसान सत्तासीन AIADMK पार्टी को हो सकता है. यही नहीं ना केवल विधानसभा चुनाव में इसका असर होगा बल्कि इसका प्रभाव आगामी लोकसभा चुनाव में देखने को मिलेगा. रजनीकांत अगर अलग पार्टी बनाकर भी चुनाव लड़ते भी हैं तो इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिलेगा. तमिलनाडु की सियासत में एआईएडीएमके के पास जयललिता के बाद और डीएमके में कोई भी ऐसा नेता नहीं है जो अपने दम पर चुनाव जीता सके. ओपीएस, ईपीएस और दीनाकरन जैसे नेताओं का दायरा सीमित हैं. द्रमुक की बागडोर स्टालिन के हाथों में है, पिछले दो चुनावों उनके नेतृत्व में लड़े गए लेकिन पार्टी को जीत नहीं दिला सके हैं. ऐसे में रजनीकांत के सुपरस्टार वाली छवि का फायदा उनकी पार्टी को मिलेगा. हालांकि, अभी रजनीकांत की सियासी तस्वीर बहुत साफ नहीं है कि वो आगे कैसे बढ़ाएंगे और किनके सहारे आगे बढ़ेंगे.

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