न्यायपालिका में हस्तक्षेप पर CJI को लिखे जस्टिस चेलमेश्वर के पत्र पर बार काउंसिल ने बुलाई बैठक

0
86

बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने शनिवार को 11 बजे एक बड़ी बैठक बुलाई है. इस बैठक में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा से जस्टिस जे. चेलमेश्वर की उस रिक्वेस्ट पर चर्चा होगी, जिसमें उन्होंने चीफ जस्टिस से ज्यूडिशियरी में कथित हस्तक्षेप पर फुल कोर्ट में बहस की मांग की थी. बड़े ही अर्थपूर्ण ढंग से चीफ जस्टिस को लिखे अपने पत्र में जस्टिस चेलमेश्वर ने कर्नाटक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस दिनेश माहेश्वरी के उस फैसले पर सवाल उठाया, जिसमें माहेश्वरी ने डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज कृष्णा भट के खिलाफ जांच के आदेश दिए थे. जस्टिस चेलमेश्वर ने अपने पत्र में लिखा है, ‘कृष्णा भट ने जब पहली श्रेणी की ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट शशिकला के कथित गलत व्यवहार के खिलाफ हाईकोर्ट को रिपोर्ट भेज दी, तो इस मजिस्ट्रेट ने भट के खिलाफ उस समय शिकायत की, जब उन्हें प्रोन्नत किया जाना था.’ चेलमेश्वर ने आगे पूरा विवरण देते हुए लिखा है, ‘जांच के बाद कर्नाटक हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस ने पाया कि शशिकला के आरोप गलत और मनगढ़ंत हैं. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने सिफारिश की कि भट को हाईकोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश पर प्रोन्नत किया जा सकता है.’ उन्होंने आगे लिखा है, लेकिन सरकार ने उनकी प्रोन्नति को रोके रखा, और भट के पांच जूनियर जजों को प्रोन्नत करने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया.’ चेलमेश्वर ने लिखा है, ‘अब जो हुआ वो बेहद चौंकाने वाला था, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी. यदि सरकार के पास कृष्णा भट के नामांकन को लेकर किसी तरह की राय या रिजर्वेशन था, तो वो उनके नामांकन को पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकती थी. ऐसी एक पुरानी और सुदृढ़ परंपरा है, लेकिन सरकार भट की फाइल को दबाए रही.’ पत्र में उन्होंने आगे लिखा है, ‘सरकार के लिए सुप्रीम कोर्ट की सिफारिशों को दबाए रखना ‘एक पैमाना’ और ‘दुखदायी’ हो सकता है. लेकिन योग्य जजों और जज बनने वालों को इसी रास्ते बाईपास किया जाता है.’ ”जहां तक मुझे याद है, पिछली सरकारों में ऐसा कभी नहीं होता था कि कार्यपालिका, सुप्रीम कोर्ट की सिफारिशों को बाईपास करे, और खासतौर पर तब जब शीर्ष कोर्ट की सिफारिशें पेंडिंग हों. जैसेकि ये कोई अंतरविभागीय मामला हो. बावजूद इसके कि सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा की तरह आरोपों को वर्गीकृत करके खारिज कर दिया हो. वहीं हमारी सिफारिशों का हाईकोर्ट के जरिए पुर्नमूल्यांकन कराने की कोशिशें अनुचित और उद्दंड हैं.” अपने पत्र में जस्टिस जे. चेलमेश्वर ने बींघम को उद्धृत करते हुए लिखा है, ‘दुनिया में ऐसे देश हैं जहां सभी न्यायिक आदेशों को सत्ता का समर्थन मिलता है, लेकिन ये वो जगहें नहीं हैं, जहां हममें से कोई रहने की इच्छा रखना चाहेगा.’

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here