‘राष्ट्रहित’ में रूसी गोर्शकोव की बढ़ी कीमत नहीं बताएगी सरकार

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राफेल की कीमतों को सार्वजनिक करने को लेकर अभी बवाल चल ही रहा था कि इस बीच रक्षा मंत्रालय ने रूसी एयरक्राफ्ट कैरियर एडमिरल गोर्शकोव (आईएनएस विक्रमादित्य) की बढ़ी कीमत का खुलासा करने से इंकार कर दिया है. इसके लिए भी राष्ट्रहित और राजनयिक हितों का हवाला दिया गया है. सरकार ने कहा है कि राष्ट्रहित में यह भी नहीं बताया जा सकता कि किस वजह पुराना जहाज मंगाया गया और क्यों कीमत ज्यादा दी गई. गौरतलब है कि रूस से करीब 35 साल पुराने एयरक्राफ्ट कैरियर एडमिरल गोर्शकोव का रीफर्ब‍िश्ड मॉडल यानी पुराने को ही नया स्वरूप देकर भारत भेजा गया. 1982 में इस एयरक्राफ्ट करियर को सबसे पहले रूस ने बाकू के नाम से लॉन्च किया गया था, बाद में 1991 में इसका नाम एडमिरल गोर्शकोव नाम रख दिया गया. इसे भारत में आईएनएस विक्रमादित्य नाम दिया गया. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, इस एयरक्राफ्ट करियर के सौदे पर साल 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार ने दस्तखत किए थे. तब यह सौदा 97.4 करोड़ डॉलर का हुआ था, लेकिन साल बाद में इसकी कीमत बढ़ाकर 2.35 अरब डॉलर कर दी गई. केंद्रीय सूचना आयोग ने सरकार से यह बताने को कहा कि यह किस कीमत पर आ रहा है और पुराने सौदे के मुकाबले कीमत में कितनी बढ़ोतरी की गई है. आरटीआई एक्टिविस्ट सुभाष अग्रवाल की याचिका पर सीआईसी ने इसकी जानकारी सार्वजनिक करने का आदेश दिया था. लेकिन सीवीसी के इस आदेश को रक्षा मंत्रालय ने हाईकोर्ट में चुनौती दी है. रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि देश हित और राजनयिक हितों को देखते हुए बढ़ी कीमत और किस वजह से कीमत बढ़ाई गई, इसकी जानकारी नहीं दी जा सकती. सीआईसी ने सरकार से यह बताने को कहा था कि नए एयरक्राफ्ट कैरियर को खरीदने की जगह रीफर्ब‍िश्ड क्यों मंगाया जा रहा है और इन पर पूरी लागत कितनी आ रही है, इसकी जानकारी वह दे. सीआईसी ने कहा कि सरकार यह बताए कि पुराने जहाज के मॉडिफिकेशन और रिनोवेशन पर कितना खर्च आया है. लेकिन कोर्ट में दी गई लिखित याचिका में रक्षा मंत्रालय ने उसी तरह का दावा किया है जैसा कि राफेल मामले में किया गया था. मंत्रालय ने कहा है कि भारत और रूस के बीच हुए अंतर सरकारी समझौते की वजह से इस तरह के विवरण का खुलासा नहीं किया जा सकता और इसे आरटीआई एक्ट से छूट हासिल है.

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